उच्चतम न्यायालय का एक और महत्वपूर्ण फैसला

भारतीय सेना में लैंगिक समानता की दिशा में आज एक नया अध्याय लिखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला अधिकारियों के पक्ष में एक युगांतरकारी फैसला सुनाते हुए आदेश दिया है कि उन्हें अब *परमानेंट कमीशन (PC)* देने के मार्ग में कोई भी कृत्रिम बाधा नहीं आएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सेना में योग्यता का पैमाना लिंग के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
*फैसले के मुख्य बिंदु: न्याय की जीत*
अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं, जो सैन्य प्रशासन के पुराने ढर्रे को बदलने वाली हैं:
* *’कोटा सिस्टम’ का अंत:* सरकार ने प्रति वर्ष केवल 250 महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की जो सीमा तय की थी, उसे कोर्ट ने *”मनमाना और भेदभावपूर्ण”* करार देकर रद्द कर दिया है।
* *समान मूल्यांकन:* कोर्ट ने निर्देश दिया कि महिला अधिकारियों के करियर और ACR (Annual Confidential Report) का मूल्यांकन उन्हीं मानकों पर किया जाए, जिन पर पुरुष अधिकारियों का होता है।
* *पिछली गलतियों का सुधार:* मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सालों से महिला अधिकारियों के साथ “सिस्टमैटिक भेदभाव” हुआ है। अब सेना को अपनी चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना होगा।
*पेंशन और भविष्य की सुरक्षा*
अदालत ने उन महिला अधिकारियों के लिए भी राहत के दरवाजे खोले हैं जो सेवा में लंबा समय बिता चुकी हैं:
> “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने जैसा है। वे महिला अधिकारी जिन्होंने 14 साल की सेवा पूरी कर ली है, वे अब पूर्ण पेंशन लाभ की हकदार होंगी।”
*क्यों अहम है यह फैसला?*
यह मामला पिछले कई दशकों से कानूनी लड़ाई का हिस्सा रहा है। 2020 में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया था, लेकिन उसके क्रियान्वयन में कई तकनीकी दिक्कतें आ रही थीं। आज के फैसले ने उन सभी ‘लूपहोल्स’ (खामियों) को बंद कर दिया है जिनका हवाला देकर महिला अधिकारियों को स्थायी सेवा से रोका जा रहा था।
भविष्य पर प्रभाव
इस फैसले के बाद अब महिला अधिकारी न केवल लंबे समय तक सेना में सेवा दे सकेंगी, बल्कि वे *कर्नल और उससे ऊपर के रैंक* तक पहुँचने और कमांडिंग ऑफिसर (CO) बनने की दिशा में बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ सकेंगी।
भारतवर्ष समाचार ब्यूरो
रिपोर्ट

