भोपाल : मध्य प्रदेश में सरकारी धन के उपयोग और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीद की जाँच के दौरान सामने आई कथित वित्तीय अनियमितताओं ने सरकारी खरीद प्रणाली, अधिकारियों की जवाबदेही और सार्वजनिक धन की सुरक्षा पर बहस तेज कर दी है।
25 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदेश के 374 नगरीय निकायों द्वारा पिछले तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की गई। विभागीय समीक्षा में यह अनुमान सामने आया कि यदि खरीद औसत बाजार दरों के आसपास की जाती, तो लगभग 250 करोड़ रुपये की बचत संभव थी। इस मामले में लोकायुक्त द्वारा जाँच शुरू किए जाने की भी खबर है।
हालाँकि, संभावित बचत की पूरी राशि को अंतिम रूप से सिद्ध घोटाले की रकम मानना उचित नहीं होगा। वास्तविक वित्तीय नुकसान का निर्धारण जाँच, खरीद के दस्तावेजों, वस्तुओं की गुणवत्ता और प्रचलित बाजार दरों के सत्यापन के बाद ही किया जा सकता है।
**आखिर सरकारी खरीद में गड़बड़ी कैसे सामने आई?**
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकारी खरीद के आँकड़ों की समीक्षा में एक जैसी या मिलती-जुलती वस्तुओं के लिए अलग-अलग नगरीय निकायों द्वारा चुकाई गई कीमतों में असामान्य अंतर दिखाई दिया।
उदाहरण के तौर पर, एक निकाय द्वारा कचरा उठाने वाला वाहन लगभग दो लाख रुपये में खरीदे जाने की जानकारी सामने आई, जबकि दूसरे निकाय में इसी प्रकार के वाहन और अतिरिक्त सामान के लिए लगभग छह लाख रुपये खर्च किए जाने का उल्लेख हुआ।
इसी तरह, एलईडी लाइटों और सफाई में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की खरीद दरों में भी भारी अंतर की बात सामने आई। इन उदाहरणों ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या सरकारी खरीद से पहले बाजार दरों, वास्तविक जरूरतों और उत्पादों की गुणवत्ता का पर्याप्त मूल्यांकन किया गया था।
यदि किसी वस्तु की कीमत वास्तविक बाजार मूल्य से बहुत अधिक पाई जाती है, तो उसके कारणों की जाँच आवश्यक है। हालाँकि, अलग-अलग उत्पाद विनिर्देश, गुणवत्ता, मात्रा, परिवहन और अतिरिक्त सुविधाओं को ध्यान में रखे बिना केवल कीमतों के अंतर को भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
**कार्रवाई और जाँच: अब तक क्या सामने आया?**
25 अक्टूबर 2026 की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में लोकायुक्त ने जाँच शुरू की है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग की ओर से भी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई किए जाने की जानकारी दी गई है।
रिपोर्टों में 392 अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई का उल्लेख है। इनमें 135 मुख्य नगर पालिका अधिकारी शामिल बताए गए हैं। सात अधिकारियों को सेवा से हटाए जाने, तीन करोड़ रुपये से अधिक की वसूली और 80 से अधिक ठेकेदारों अथवा आपूर्तिकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई की जानकारी भी सामने आई है।
इन आँकड़ों की अंतिम स्थिति और प्रत्येक अधिकारी या ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई का आधार संबंधित विभागीय आदेशों तथा जाँच अभिलेखों से सत्यापित किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति के विरुद्ध जाँच या विभागीय कार्रवाई होना अपने आप में आपराधिक दोष सिद्ध होने के समान नहीं है।
**सवाल केवल खरीद का नहीं, जनता के अधिकार का भी है**
सरकारी खजाने में जमा धन जनता की मेहनत, करों और विभिन्न सार्वजनिक संसाधनों से आता है। इस धन का उपयोग शहरों की सफाई, सड़कों, स्ट्रीट लाइटों, जल निकासी, कचरा प्रबंधन और अन्य नागरिक सुविधाओं के लिए किया जाता है।
यदि किसी सरकारी निकाय में आवश्यकता से अधिक कीमत पर सामान खरीदा जाता है, तो उसका सीधा प्रभाव सार्वजनिक संसाधनों के बेहतर उपयोग पर पड़ सकता है। निर्धारित बजट में अधिक खर्च होने से दूसरी जरूरी परियोजनाओं के लिए उपलब्ध धन भी प्रभावित हो सकता है।
इसलिए सरकारी खरीद में पारदर्शिता केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि नागरिकों के प्रति जवाबदेही का प्रश्न है।
ठेकेदारों और अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जाँच जरूरी
किसी भी खरीद प्रक्रिया में अधिकारियों, आपूर्तिकर्ताओं और ठेकेदारों की भूमिकाओं की जाँच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।
जाँच एजेंसियों को यह देखना चाहिए कि क्या वस्तुओं की खरीद वास्तविक आवश्यकता के अनुसार हुई, क्या प्रतिस्पर्धी दरों का उचित मूल्यांकन किया गया, क्या निविदा प्रक्रिया का पालन हुआ और क्या खरीदी गई सामग्री निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप थी।
इसके साथ ही, यदि किसी मामले में मिलीभगत, फर्जी दस्तावेजों, अनुचित भुगतान या सरकारी धन के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, जिन अधिकारियों या संस्थाओं के विरुद्ध आरोप प्रमाणित नहीं होते, उन्हें भी निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार मिलना चाहिए।
**सुधार के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?**
मध्य प्रदेश में सरकारी खरीद व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कुछ ठोस कदम उपयोगी हो सकते हैं।
पहला, सभी नगरीय निकायों की बड़ी खरीद का नियमित स्वतंत्र ऑडिट किया जाए।
दूसरा, समान उत्पादों की खरीद दरों की तुलना करने के लिए एक पारदर्शी डिजिटल प्रणाली विकसित की जाए।
तीसरा, सरकारी खरीद के आदेश, वस्तुओं की मात्रा, स्वीकृत दरें और आपूर्ति की स्थिति से संबंधित जानकारी कानून के अनुरूप सार्वजनिक की जाए।
चौथा, जिन मामलों में वित्तीय अनियमितताएँ प्रमाणित हों, उनमें जिम्मेदारी तय करके समयबद्ध कार्रवाई की जाए।
पाँचवाँ, शिकायतकर्ताओं और सूचना देने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, ताकि अनियमितताओं की जानकारी सामने लाने में किसी को अनुचित दबाव का सामना न करना पड़े।
निष्कर्ष: जवाबदेही से ही मजबूत होगा जनता का भरोसा
मध्य प्रदेश में सरकारी खरीद को लेकर सामने आए ये मामले इस बात की याद दिलाते हैं कि सरकारी धन के खर्च पर निरंतर निगरानी कितनी आवश्यक है। करोड़ों रुपये की संभावित बचत का सवाल हो या खरीद दरों में दिखाई देने वाले असामान्य अंतर का, प्रत्येक तथ्य की निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच होनी चाहिए।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कार्रवाई की घोषणा करना नहीं, बल्कि जाँच के निष्कर्षों, वसूली, दोष निर्धारण और सुधारात्मक कदमों की जानकारी भी जनता तक पहुँचाना है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है और उन सवालों का तथ्यों के साथ जवाब देना शासन की जिम्मेदारी। सरकारी खजाने के प्रत्येक रुपये का हिसाब सार्वजनिक हित, पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी पर होना चाहिए।
रविन्द्र तिवारी
भारतवर्ष समाचार
(Digital)
भोपाल













