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एन.आर.सी.सी. की विशेषज्ञ टीम जैसलमेर के ऊँटों में फैली बीमारी की पहचान व उपचार हेतु पहुँची

एन.आर.सी.सी. की विशेषज्ञ टीम जैसलमेर के ऊँटों में फैली बीमारी की पहचान व उपचार हेतु पहुँची

बीकानेर की रिपोर्ट

बीकानेर, 02 जनवरी 2026 । भा.कृ.अनु.प.–राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीसी), बीकानेर द्वारा भारत सरकार की अनुसूचित जाति उप-योजना के अंतर्गत जैसलमेर जिले के ग्राम सांवता में दिनांक 02 जनवरी 2026 को पशु स्वास्थ्य शिविर-सह-कृषक-वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आयोजित शिविर में ग्राम सांवता के लगभग 100 पशुपालकों ने सहभागिता करते हुए अपने पशुओं—ऊँट (420), गाय (279), भेड़ एवं बकरी (649) सहित कुल 1348 पशुओं के स्वास्थ्य परीक्षण एवं उपचार सेवाओं का लाभ लिया। शिविर में महिलाओं की उल्लेखनीय सहभागिता भी देखने को मिली। केन्द्र की विशेषज्ञ टीम द्वारा ऊँटों में फैली बीमारी की पहचान व उपचार हेतु पशुओं से रक्त नमूने जांच के लिए गए। साथ ही ऊँटों में सर्रा रोग के बचाव एवं उपचार हेतु आवश्यक टीकाकरण भी किया गया।

 

इस दौरान केन्द्र निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने पशुपालकों को भारत सरकार की अनुसूचित जाति उप-योजना का अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया तथा पशुधन से बेहतर उत्पादन एवं आय वृद्धि हेतु अद्यतन पशुपालन तकनीकों को अपनाने पर बल दिया। उन्होंने एन.आर.सी.सी. एवं वैश्विक शोध के आधार पर बताया कि ऊँटनी के दूध में महत्त्वपूर्ण औषधीय गुण पाए जाते हैं, जो मधुमेह, टी.बी. एवं ऑटिज़्म जैसे मानवीय रोगों के प्रबंधन में सहायक हैं। डॉ. पूनिया ने जैसलमेर को ऊँट-बहुल क्षेत्र बताते हुए ऊँटनी दुग्ध आधारित उद्यमिता की व्यापक संभावनाओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया तथा पर्यटन की दृष्टि से ऊँटों के महत्त्व एवं एन.आर.सी.सी. द्वारा विकसित ऊँटनी दूध से बने मूल्य-संवर्धित उत्पादों को पशुपालकों के लिए आय का एक लाभकारी एवं टिकाऊ साधन बताया।

केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राकेश रंजन ने कहा कि पशुपालकों के जीवन में पशुधन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपील की कि पशुओं में किसी भी अज्ञात बीमारी, असामान्य लक्षण अथवा अचानक मृत्यु की स्थिति में बिना विलंब नजदीकी पशु चिकित्सक को सूचित करें अथवा तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लें, ताकि समय रहते उचित उपचार कर रोग के फैलाव को रोका जा सके और पशुधन हानि से होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाव किया जा सके।

केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. श्याम सुंदर चौधरी ने पशुपालकों को जाड़े के मौसम में पशुओं की उचित देखभाल के संबंध में जानकारी देते हुए ठंड से बचाव, संतुलित आहार, स्वच्छ बिछावन एवं नियमित स्वास्थ्य परीक्षण पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने सर्दियों में होने वाले रोगों की रोकथाम हेतु उचित औषधियों के समय पर उपयोग, टीकाकरण तथा थनैला आदि रोगों के उपचार की आवश्यकता बताई। इस अवसर पर केन्द्र के पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. काशी नाथ ने बताया कि इस उप-योजना के अंतर्गत लाए गए अधिकांश पशुओं में चीचड़ संक्रमण एवं शीत ऋतु से संबंधित सामान्य पशु रोग अधिक पाए गए, जिनके नियंत्रण हेतु आवश्यक उपचार किया गया। साथ ही पशुओं में खनिज तत्वों की पूर्ति के लिए पशुपालकों को नमक की ईंटें एवं केन्द्र द्वारा निर्मित करभ पशु आहार का वितरण किया गया।

कार्यक्रम के दौरान श्री सुमेर सिंह, प्रगतिशील पशुपालक एवं अध्यक्ष, श्री देगराय उष्‍ट्र संरक्षण समिति, जैसलमेर ने ऊँट पालकों के कल्याण एवं ऊँटों में फैले रोग की पहचान हेतु एन.आर.सी.सी. द्वारा किए जा रहे त्वरित एवं प्रभावी प्रयासों के लिए आभार व्यक्त किया।

केन्द्र की एस.सी.एस.पी. उप-योजना के नोडल अधिकारी श्री मंजीत सिंह ने उप-योजना के उद्देश्य, महत्त्व एवं एन.आर.सी.सी. की प्रसार गतिविधियों के बारे में जानकारी दी। केन्द्र के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री अखिल ठुकराल तथा वित्त एवं लेखा अधिकारी श्री आशीष पित्ती ने एस.सी.एस.पी. उप-योजना के अंतर्गत पशुपालकों के लिए निर्धारित प्रावधानों के साथ-साथ एन.आर.सी.सी. द्वारा प्रदान की जा रही सुविधाओं की विस्तृत जानकारी दी। शिविर के सफल आयोजन में सहायक प्रशासनिक अधिकारी श्री राजेश चौधरी एवं श्री हरजिन्‍दर ने पशुपालकों के पंजीयन, उपचार एवं आहार वितरण जैसे कार्यों में सक्रिय सहयोग प्रदान किया।

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