
एक पत्रकार के जीवन की सच्चाई और उसका दर्द सच में पत्रकारिता बड़ा अजीब पेशा है। बाहर से देखने वालों को लगता है कि पत्रकार बड़ा ताकतवर आदमी होता है। उसकी. बड़े लोगों से जान–पहचान होती है, नेताओं से अच्छी पकड़ होती है, अफसर उसे सलाम करते हैं, लोग उसे टीवी और अखबार में देखते हैं। लेकिन सच पूछिए तो पत्रकार सबसे ज्यादा अकेला आदमी होता है। वो जब घर से निकलता है तो सिर्फ दरवाज़ा बंद नहीं करता, अपने हिस्से की खुशियाँ भी पीछे छोड़ आता है।
सुबह माँ दरवाज़े तक छोड़ने आती है। कहती है “जल्दी आ जाना बेटा…” और पत्रकार मुस्कुरा देता है, क्योंकि उसे खुद नहीं पता होता कि वो लौटेगा कब। कभी किसी दुर्घटना की खबर, कभी किसी मंत्री का दौरा, कभी किसी आंदोलन की कवरेज, कभी रात के दो बजे तक थाने के बाहर खड़ा रहना। उसकी जिंदगी का कोई समय नहीं होता। वो दूसरों की जिंदगी की खबरें लिखता है लेकिन उसकी अपनी जिंदगी हर दिन बिना खबर के गुजरती रहती है।
पत्रकार के पास पूरे जिले की जानकारी होती है, मगर अपने बच्चे की पसंद का खिलौना कौन सा है ये उसे नहीं पता होता। उसे ये पता होता है कि किस सड़क पर गड्ढा है, कहाँ भ्रष्टाचार हुआ, किस गाँव में पानी नहीं पहुँच रहा, मगर उसे ये पता नहीं होता कि उसकी बूढ़ी माँ कई दिनों से उसके साथ बैठकर सिर्फ दो बातें करना चाहती है।
धीरे-धीरे पत्रकारिता आदमी को भीतर से खा जाती है। पहले उसका समय छिनता है, फिर उसकी नींद, फिर उसका सुकून और आखिर में उसका अपना अस्तित्व। वो दूसरों के दर्द को शब्द देता रहता है लेकिन उसका दर्द हमेशा बिना शब्दों के रह जाता है।
एक पत्रकार जब किसी हादसे की कवरेज करता है तो कैमरे में सिर्फ तस्वीरें नहीं कैद होतीं, उसके भीतर भी बहुत कुछ टूटता है। सड़क पर बिखरा खून, रोती हुई माँ, बर्बाद परिवार, जलती लाशें, भूख से तड़पते लोग ये सब धीरे-धीरे उसके भीतर जमा होता रहता है। लेकिन उससे उम्मीद की जाती है कि वो हमेशा मजबूत दिखे। कैमरे के सामने उसकी आवाज नहीं कांपनी चाहिए, उसकी आँखें नहीं भरनी चाहिए।
सबसे खोज तो यही है कि जो आदमी पूरे समाज से सवाल पूछता है, उसके अपने सवाल सुनने वाला कोई नहीं होता। नेता उसे इस्तेमाल करते हैं, अफसर उससे बचते हैं, समाज उससे उम्मीद करता है, लेकिन पत्रकार जब खुद टूटता है तो उसके पास लौटने के लिए सिर्फ थकान बचती है।
घर में पिता बीमार हैं, बहन की शादी की चिंता है, बच्चों की फीस जमा करनी है, पत्नी नाराज है कि तुम कभी घर पर नहीं रहते, लेकिन पत्रकार के पास इन सबके लिए समय नहीं है। क्योंकि उसे “ड्यूटी” पर जाना है। यह ड्यूटी धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बन जाती है और जिंदगी उससे दूर चली जाती है।
पत्रकारिता में सबसे पहले आदमी की मुस्कान मरती है। फिर उसके सपने मरते हैं। फिर उसका निजी जीवन खत्म होता है। और आखिर में वो सिर्फ एक चलता-फिरता माइक बनकर रह जाता है। लोग उसे नाम से नहीं, चैनल और अखबार से पहचानने लगते हैं।
त्योहार भी उसके लिए त्योहार नहीं रहते। होली पर वो रंग नहीं खेलता, किसी मंत्री की होली मिलन कवरेज करता है। दीवाली पर वो अपने घर की रोशनी नहीं देख पाता क्योंकि उसे शहर की सुरक्षा व्यवस्था की रिपोर्टिंग करनी होती है। ईद पर वो सेवइयाँ नहीं खाता, ट्रैफिक व्यवस्था दिखा रहा होता है।
और सबसे दुखद बात ये है कि पत्रकार धीरे-धीरे अपने परिवार में भी मेहमान बन जाता है। बच्चे उसके आने का इंतजार करते-करते सो जाते हैं। पत्नी बात करने की कोशिश करती है लेकिन वो मोबाइल पर खबर भेजने में लगा होता है। माँ उसकी आवाज सुनने के लिए तरस जाती है।
कई पत्रकार ऐसे होते हैं जिनकी जेब में हजारों लोगों के नंबर होते हैं, लेकिन मुश्किल वक्त में फोन करने के लिए एक अपना आदमी नहीं होता। वो दूसरों के दुख में सबसे पहले पहुँचते हैं, लेकिन उनके दुख में अक्सर कोई नहीं पहुँचता।
पत्रकारिता ने ना जाने कितने लोगों को समय से पहले बूढ़ा कर दिया। चेहरे पर तनाव, आँखों में थकान, जेब में कमी और भीतर एक अजीब सा खालीपन। वो हँसते जरूर हैं लेकिन दिल से नहीं। क्योंकि उन्होंने जिंदगी को बहुत करीब से टूटते देखा होता है।
एक समय आता है जब पत्रकार आईने में खुद को देखता है और सोचता है कि क्या यही वो जिंदगी थी जिसका सपना उसने देखा था? उसने सोचा था कि वो समाज बदलेगा, व्यवस्था सुधारेगा, सच सामने लाएगा। लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि इस लड़ाई में सबसे ज्यादा वही बदल गया।
अब उसे बारिश अच्छी नहीं लगती क्योंकि बारिश मतलब जलभराव की खबर। उसे भीड़ अच्छी नहीं लगती क्योंकि भीड़ मतलब तनाव। उसे फोन की घंटी से डर लगने लगता है क्योंकि हर कॉल के पीछे कोई नई परेशानी होती है।
पत्रकार की जिंदगी बाहर से जितनी चमकदार दिखाई देती है, भीतर से उतनी ही थकी हुई होती है। उसके पास पहचान होती है, लेकिन सुकून नहीं। उसके पास शब्द होते हैं, लेकिन अपने लिए वक्त नहीं।
और अंत में वही पत्रकार, जो पूरी जिंदगी दूसरों की खबरें लिखता रहा, एक दिन खुद एक छोटी सी खबर बनकर रह जाता है। दो दिन श्रद्धांजलि चलती है, कुछ लोग सोशल मीडिया पर दुख लिखते हैं, फिर दुनिया आगे बढ़ जाती है।
लेकिन सच यही है कि पत्रकार जब पत्रकारिता पर निकलता है तो सिर्फ घर नहीं छोड़ता, वो धीरे-धीरे अपनी पूरी जिंदगी पीछे छोड़ आता है।
सर्च स्टोरी के द्वारा संपादित
आलेख—रविन्द्र तिवारी
भारतवर्ष समाचार जिला ब्यूरो






