इंदौर जल त्रासदी को लेकर बड़ा खुलासा

जहरीले पानी मामले में हाईकोर्ट में सरकारी कबूलनामा..
इंदौर के 4965 ट्यूबवेल का पानी दूषित, फिर भी हो रही थी सप्लाई
इंदौर दूषित पेयजल को लेकर माननीय उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ में याचिकाकर्ता समाजसेवी एवं पूर्व भाजपा पार्षद महेश गर्ग की ओर से पेश जनहित याचिका (डब्ल्यूपी 2096/2015) में बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। याचिका में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) मेंटेनेंस डिवीजन नंबर-2 के कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव द्वारा दाखिल शपथपत्र में स्वीकार किया गया है कि शहर के 4965 ट्यूबवेल, बोरिंग और हैंडपंप का पानी पीने योग्य नहीं है।बावजूद इसके दूषित पानी की भागीरथपुरा समेत पूरे शहर में सप्लाई जारी थी?
पानी के आंकड़ों में भी खेल उजागर
शपथपत्र में यह भी स्वीकार किया गया कि जल उपलब्धता को लेकर विभाग ने अलग-अलग हलफनामों में दो भिन्न आंकड़े पेश किए—314.75 एमएलडी और 258.4 एमएलडी। दोनों के बीच 56.71 एमएलडी का अंतर सामने आया, जिसे पहले स्पष्ट नहीं किया गया था। अब सफाई दी गई कि यह अंतर ट्यूबवेल के 70 एमएलडी पानी और उस पर दर्शाए गए 20 प्रतिशत वितरण नुकसान के कारण है। सवाल यह है कि जब ट्यूबवेल का पानी खुद ही पीने लायक नहीं था, तो उसे कुल आपूर्ति में शामिल क्यों किया गया?
हमने ट्यूबवेल लगाए ही नहीं’… जिम्मेदारी से झाड़ा पल्ला
शपथपत्र में यह भी कहा गया कि ट्यूबवेल PHE विभाग ने नहीं लगाए, बल्कि विधायक, सांसद और पार्षद निधि से अन्य विभागों द्वारा लगाए गए। यानी जहरीला पानी जनता तक पहुंचा, लेकिन जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।
188 ट्यूबवेल चिन्हित, बिजली काटने की कार्रवाई शुरू
दाखिल जवाब के जरिये अदालत को बताया गया था कि सर्वे के दौरान अब तक 188 ऐसे ट्यूबवेल चिन्हित किए गए हैं, जो केवल 1 से 15 घरों को पानी दे रहे थे। इनके बिजली कनेक्शन काटने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके अलावा धर्मशालाओं में लगे ट्यूबवेल के बिजली कनेक्शन काटने की मंजूरी भी ली गई है।
रिपोर्ट में साफ लिखा ,पानी पीने योग्य नहीं
नगर निगम की फूड लेबोरेटरी की केमिस्ट रिपोर्ट को भी शपथपत्र के साथ संलग्न किया गया है, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि ट्यूबवेल, बोरिंग और हैंडपंप का पानी ‘नॉट पोटेबल’ यानी पीने योग्य नहीं है। इसके बावजूद वर्षों तक यही पानी आम जनता को सप्लाई होता रहा।
सर्वे अभी जारी, लेकिन कब मिलेगा साफ पानी?
सरकार की ओर से कहा गया कि शहरभर में फैले ट्यूबवेल और हैंडपंप की पहचान व कार्रवाई एक लंबी प्रक्रिया है और सर्वे अभी जारी है। हालांकि, सवाल यह है कि जब रिपोर्ट में पानी को जहरीला बताया जा चुका है, तब तक जनता को कौन बचाएगा?
इतने गंभीर खुलासों के बावजूद कार्यपालन यंत्री ने अदालत से जनहित याचिका को बिना मेरिट बताते हुए खारिज करने की प्रार्थना भी की थी।
हाईकोर्ट में पेश यह शपथपत्र प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है,जब पानी जहरीला था, तब चुप्पी क्यों?और अगर सब पता था, तो जिम्मेदार कौन?
सूत्रों के हवाले से प्राप्त जानकारी के अनुसार
रविन्द्र तिवारी
भारतवर्ष समाचार
भोपाल






